पंडित बालकृष्ण भट्ट पर निबंध | Biography of balkrishna bhatt

balkrishna bhatt par nibandh

जीवन परिचय

आधुनिक हिन्दी साहित्य के भारतेन्दु युग के गद्यकारों में श्रेष्ठ पंडित बाल कृष्ण भट्ट का जन्म 3 जून , 1844 ई० में इलाहाबाद में हुआ था । उनके पिता का नाम पंडित बेनी प्रसाद था । इन की प्रारम्भिक शिक्षा मिशन स्कूल में हुई थी । संस्कृत की शिक्षा उन्होंने अपने घर पर प्राप्त की थी । शिक्षा समाप्त करने के पश्चात उन्होंने मिशन स्कूल और कायस्थ पाठशाला में अध्यापक के रूप में कार्य किया था । बाद में नौकरी छोड़कर स्वतंत्र लेखन कार्य करने लगे । इन्होंने इलाहाबाद में भारती भवन पुस्तकालय की स्थापना की थी । इन्होंने हिन्दी वर्द्धिनी सभा , इलाहाबाद की ओर से 1 सितम्बर 1877 ई० को हिन्दी प्रदीप नामक मासिक पत्र निकाला और लगातार 32 वर्षों तक इस का सम्पादन करते रहे । 20 जुलाई , 1914 ई० में उनका देहावसान हो गया ।

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साहित्य

पंडित बाल कृष्ण भट्ट को बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार माना जाता है । उन्होंने निबन्ध , कहानी , उपन्यास , नाटक आदि की रचना करने के साथ – साथ सम्पादन कार्य भी किया था । इस की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं:-

निबन्ध संग्रह

साहित्य सरोज , साहित्य सुमन , भट्ट निबंधावली भाग एक और दो ।

उपन्यास

नूतन ब्रह्मचारी , सौ अजान एक सुजान

नाटक

बालविवाह , दमयन्ती स्वयंवर , वेणी संहार , पद्मावती , रेल का विकट खेल ।

हिन्दी साहित्य में निबन्धकला के प्रवर्त्तक के रूप में पंडित बाल कृष्ण भट्ट को स्मरण किया जाता है । क्योंकि इन्होंने ही सर्वप्रथम मौलिक चिन्तन से पूर्ण निबन्ध लिखना प्रारम्भ किया था । उन्होंने एक हजार के लगभग निबंध लिखे हैं जिन्हें निम्नलिखित भागों में विभाजित कर सकते हैं :-

सामाजिक निबंध

पंडित बाल कृष्ण भट्ट द्वारा रचित सामाजिक निबंधों के अन्तर्गत वे निबंध आते हैं जिनमें उन्होंने तत्कालीन सामाजिक जीवन से सम्बन्धित किसी समस्या का विश्लेषण किया है । उन निबंधों में संयुक्त परिवार प्रथा के गुण – दोष , पाखंडी साधु – सन्यासियों , तीर्थस्थलों पर व्याप्त भ्रष्टाचार , बाल विवाह , विधवा विवाह , अनमेल विवाह , रूढ़िवादिता , स्त्री शिक्षा , वैश्यावृति आदि विषयों पर लेखक ने अपने विचार व्यक्त किए हैं । उन्होंने ने अपने इन निबंधों के माध्यम से सामाजिक बुराईयों का विरोध करते हुए तत्कालीन समाज में नई क्रान्ति , चेतना तथा जागृति लाने का प्रयास किया था । कौलीन्य , जात – पाँत , मानवी सम्पत्ति तीर्थों की तीर्थता , कौम , भिक्षावृति , सुगृहिणी आदि इन के इसी प्रकार के निबंध हैं ।

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राजनीतिक निबंध

राजनीतिक निबंधों में भट्ट जी ने तत्कालीन शासन व्यवस्था की कटु आलोचना करते हुए उन की दोहरी नीति का भंडाफोड़ा है । इन्होंने व्यापार तथा नौकरशाही द्वारा अंग्रेजों की शोषण प्रवृत्ति कूटनीति एवं चरित्रहीनता पक्षपातपूर्ण न्याय , अनुचित करों की निन्दा , पुलिस का दमन , भाषा नीति , जमीदारों द्वारा आम जनता का शोषण , शासन में व्याप्त निबन्ध आत्मनिर्भरता भ्रष्टाचार आदि विषयों पर अधिकारिक रूप से कलम चलाई है । इन्होंने तत्कालीन सरकार के विरुद्ध जनमत जगाने के लिए देशभक्ति से पूर्ण निबंध भी लिखे हैं । व्यवस्था या कानून , राजभक्ति और देशभक्ति भेदभाव नीति प्रतिनिधि शासन , दुर्भिक्ष दलित भारत आदि इनके इसी प्रकार के प्रसिद्ध निबंध हैं ।

साहित्यिक निबंध

पंडित बाल कृष्ण भट्ट द्वारा साहित्य , साहित्य शास्त्र , भाषा , अलंकार , नाटक , रंगमंच , उपन्यास आदि विषयों पर रचित निबंध इस श्रेणी में आते हैं । इन निबंधों में लेखक के मौलिक चिन्तन के दर्शन होते हैं । सभ्यता और साहित्य , रसाभास प्रतिमा खड़ी बोली का पद्य , हिन्दी की वर्तमान दशा शब्द परिचय आदि इन के साहित्यिक निबंध हैं । इन निबंधों में लेखक ने साहित्य के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डालते हुए भाषा , भाषा में परिवर्तन , विभिन्न भाषाओं के पारस्परिक सम्बंधों पर भी प्रकाश डाला है ।

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अन्य निबंध

पंडित बाल कृष्ण भट्ट ने उपयुक्त निबंधों के अतिरिक्त मनोविज्ञान , भक्ति , ज्ञान , गृहस्थजीवन , कृषि , वाणिज्य , शिक्षा , चरित्र आदि विषयों पर भी निबंध लिखे हैं । इन निबंधों के शीर्षक ‘ चरित्र पालन , मुक्ति और भक्ति ज्ञान और भक्ति , मन और ज्ञान , नाक , कान , घर , दर्पण , सूदखोरी , लक्ष्मी वकील आदि हैं । इस निबंधों में लेखक ने सहज और स्वाभाविक भाषा में विषय का प्रतिपादन अत्यन्त कुशलता से किया है । विभिन्न विषयों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए लेखक ने जहाँ अपनी विचारगत नूतनता से परिचित कराया है वहीं उसमें वर्णन शैली की विविधता के भी दर्शन होते हैं ।

रचना शैली

रचनाशैली की दृष्टि से भट्ट जी के निबंध विचारात्मक, आलोचनात्मक, भावात्मक , वर्णनात्मक और विवरणात्मक हैं । अपने निबंधों में तत्सम प्रधान भाषा के साथ – साथ इन्होंने तत्कालीन लोक जीवन में प्रचलित उर्दू , अंग्रेजी , देशज भाषाओं के शब्दों का भरपूर प्रयोग किया है । मुहावरों , लोकोक्तियों और सूक्तियों के प्रयोग से इन के निबंध अधिक रोचक तथा प्रभावशाली बन गए हैं । इनका निबंध साहित्य अत्यन्त सहज स्वाभाविक तथा संवेदनात्मक है ।

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