कविवर वृंद की जीवनी | hindi biography of kavi vrind

kavi vrind ki jivani

जीवन परिचय

कविवर वृन्द रीतिकाल की नीतिकाव्य परम्परा के कवि हैं । नीतिकार कवियों में उनका स्थान सर्वोपरि है । कवि वृन्द का पूरा नाम वृन्दावन दास था । इनके पिता रूप जी थे तथा माता का नाम कौशल्या था । ये मूलतः बीकानेर के रहने वाले थे पर किसी कारण इनके पिता मेड़ता नामक स्थान पर आ बसे । यह स्थान जोधपुर में है । मेड़ता में ही कवि का जन्म संवत् 1700 में हुआ तथा देहावसान राजस्थान के किशनगढ़ नामक स्थान पर संवत् 1780 में हुआ । इन्होंने आरंभिक शिक्षा घर पर ही ली और बाद में काशी जाकर अपने गुरु तारा जी पंडित से संस्कृत साहित्य , वेदान्त , काव्य रचना , व्याकरण , छन्दशास्त्र आदि की शिक्षा प्राप्त की ।

अपने जीवन में कवि वृन्द विभिन्न आश्रयदाताओं के आश्रय रहे । इनमें महाराज जसवन्त सिंह , औरंगजेब , मिरजाकादरी , अजीमुश्शान , गुरु गोविन्द सिंह और महाराज राजसिंह प्रमुख हैं । इन्हीं आश्रयदाताओं के साथ रहते हुए कवि ने काशी , जोधपुर , दिल्ली , औरंगाबाद , अजमेर , ढाका , पंजाब , दक्षिण यात्रा और अन्त में किशनगढ़ आदि स्थानों की यात्राएँ की । किशनगढ़ महाराज राजसिंह ने ही इनके किशनगढ़ में कई सौ गाँव की जागीर दी । यहाँ इनके वंशज आज भी मौजूद हैं । वृन्द कवि का व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली था । वे अपने जिस भी आश्रयदाता के पास रहे वहाँ ये काव्य गुरु , या शिक्षक गुरु बनकर सम्मान प्राप्त करते रहे ।

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रचनाएँ

वृन्द कवि ने अपनी 80 वर्षों की लम्बी जीवन यात्रा में तरह – तरह के अनुभव अर्जित किए । उन्हीं अनुभवों को कवि जन्मजात प्राप्त कवि प्रतिभा के माध्यम से समय – समय पर अलग – अलग कृतियों के माध्यम से वाणी देता रहा । आज उनकी अनेक रचनाएँ प्रकाश में आ चुकी हैं । इन सभी रचनाओं में कवि ने अलग – अलग विषय को आधार बनाया है । इनकी रचनाओं में सम्मेत शिखर छंद , बारहमासा , अक्षरादि दोहे , नैन बत्तीसी , भाव पंचारिका , श्रृंगार शिक्षा , पवन पच्चीसी , हितोपदेशाष्टक , पुष्काराष्टक , भाषा हितोपदेश , नीति सतसई अथवा वृन्द विनोद सतसई , बचनिका अथवा रूपसिंह की वार्ता , यमक सतसई , सत्य स्वरूप रूपक , भारत कथा , प्रताप विलास , पति – मिलन , देवी स्तुति और स्फुट छंद आदि रचनाएँ आती हैं इन रचनाओं में नीति सतसई का बहुत महत्त्व है ।

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नीति सतसई

यह कविवर वृन्द की सर्वाधिक प्रसिद्ध और चर्चित रचना है । यह कवि की प्रसिद्धि की वास्तविक आधारशिला है । विद्वानों ने इस एक ही रचना को अलग – अलग नाम दिए हैं । गार्सा – द – तासी और आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने इसे केवल ‘ सतसई ‘ कहा है । मिश्रबन्धु , आचार्य शुक्ल और पं० अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध ने इसे ‘ वृन्द सतसई ‘ नाम दिया है । डॉ० भगीरथ मिश्र ने इसको ‘ वृन्द विनोद सतसई ‘ की संज्ञा दी है । डॉ० धीरेन्द्र वर्मा ने इसे दृष्टान्त ‘ सतसई ‘ नाम से अभिहित किया है ।

डॉ० मोतीलाल मेनारिया और डॉ० किशोरी लाल गुप्ता ने इसे ‘ वृन्द सतसई ‘ तथा ‘ दृष्टान्त सतसई ‘ दोनों नाम दिए हैं । इन सभी नामों में ‘ वृन्द विनोद सतसई ‘ नाम अधिक सटीक प्रतीत होता है । कृति के अंतिम दोहे को पढ़ने से ऐसा आभास होता है कि कवि ने इस ग्रन्थ की रचना औरंगजेब के पौत्र शाह अजीमुश्शान के विनोदार्थ की है । दूसरे , स्वयं कवि ने भी प्रस्तुत रचना के इस नाम का संकेत अपने किया है

समै सार दोहानि कौं सुनत होय मन मोद ।
प्रगत भई यह सतसई भाषा वृन्द विनोद ।।

अतः इस रचना का नाम ‘ वृन्द विनोद सतसई ‘ अधिक संगत प्रतीत होता है ।

नीति सतसई का प्रतिपाद्य नैतिक आदर्श

वृन्द का समाज में नजदीकी सम्बन्ध था । उन्होंने मध्यमवर्गीय समाज और उच्चवर्गीय समाज को अपनी आँखों से देखा था । उन्होंने दोनों प्रकार के समाजों में अनेक कटुताओं को देखा था , अनुभव किया और वाणी द्वारा उनको व्यक्त भी किया था । वृन्द ने उस समय के समाज के लिए जो सामाजिक , धार्मिक , आर्थिक , राजनैतिक आदर्श प्रस्तुत किए थे । आज उन्हें ही उनके ‘ नैतिक आदर्श ‘ का नाम दिया जाता है । इस तरह से वृन्द ने समाज के विभिन्न विषयों से संबंधित जो नैतिक विचार व्यक्त किए थे । उन्हें आज अनेक वर्गों में विभाजित करके समझा जा सकता है ।

वैयक्तिक नीति

इस क्षेत्र में यद्यपि वृन्द ने नम्रता , दया , क्षमा आदि सात्विक गुणों का कही – कही उल्लेख किया है , परन्तु राजकीय वातावरण के कारण ये इनके प्रधान विषय नहीं रहे हैं । इनके अतिरिक्त इन्होंने धन से गुणों का महत्त्व , गुण से मान , गुण और वेश , एक ही गुण से यश की प्राप्ति , पिशुन और गुण , तेजस्विता , साहस , पराक्रम आदि की प्रशंसा तथा निस्तेज की अवज्ञा , अनेक निकम्मों से एक कर्मठ की श्रेष्ठता जैसे विषयों पर वियार व्यक्त किए हैं । “

पारिवारिक नीति

कविवर वृन्द का सम्बन्ध उच्च और निम्न वर्ग के अनेक परिवारों के साथ रहा था । उन परिवारों की अच्छाइयों और बुराइयों को उन्होंने बहुत नजदीक से देखा था । अपने उसी अनुभव के आधार पर उन्होंने परिवार से जुड़ी हुई कुछ नीतिपरक व्यवहारिक बातें बताई हैं । जिन्हें परिवार के लोगों को ध्यान रखना चाहिए । पारिवारिक त की बात करते हुए उनकी यह मान्यता है कि हर परिवार का एक मुखिया होना चाहिए जो पूरे परिवार को एक सूत्र में बाँधने का कार्य करे । इसी विचार को कवि वृन्द ने इन शब्दों में व्यक्त किया है

सबही कुल में होत है , एक एक सरहार ।
गज ऐराबत सुर सुरिन्द तरुवर में मंदार ।।

कवि ने पारिवारिक नीति की चर्चा करते हुए सुपुत्र कुपुत्र की स्थिति पर भी प्रकाश डाला है । उनकी मान्यता है कि अपने दुखदायक कुपुत्र से दूसरे का सुखदायक सुपुत्र अच्छा है । उनका विचार है कि पुत्र अधिक न होकर चाहे एक हो पर वह योग्य हो , वह भी कुल की प्रतिष्ठा को बढ़ा देगा ।
कविवर वृन्द ने परिवार की चर्चा करते हुए कुल प्रभाव का भी वर्णन किया है । उनकी मान्यता है कि कुल के संस्कारों का प्रभाव आगे आने वाली पीढ़ी पर पड़ता है । इस बात को कवि ने बनिए के पुत्र के माध्यम से समझाया है कि बनिये का पुत्र व्यापार में अधिक पटु हो सकता है । वीर बनकर किला जीतने के गुण का उसमें हमेशा अभाव रहता है । यह कुल का ही प्रभाव है ।

सामाजिक नीति

वृन्द के नीति साहित्य का एक पक्ष समाज भी है । वृन्द यद्यपि दरबार में रहते थे परन्तु वे सामान्य लोकज्ञान से शून्य नहीं थे । सामाजिक रीति – नीति का इन्हें पूर्ण ज्ञान था । वे एक ओर राजा , नवाबों के बच्चों को शिक्षा देते हैं तो दूसरी ओर बनिया , गंधी लुहार की भी चर्चा करते हैं । यानी दरबार और सामान्य समाज दोनों का ही उन्हें अच्छा परिचय था । फिर भी सामान्य लोक समाज ही उनका प्रमुख क्षेत्र रहा । वे इसी क्षेत्र में जन्मे और पले थे । इसलिए उन्होंने इस समाज के अनेक विषयों पर विस्तार से वर्णन किया है ।

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निष्कर्ष

वृन्द जी हिन्दी भाषा के सबसे प्रसिद्ध कवियों में से एक हैं। हिन्दी साहित्य के कवि के रूप में वृन्द जी के काव्य लेखन ने उन्हें लोगों के दिलों में एक अनूठा स्थान दिलाया है। वृन्द जी ने लोगों को अपने दोहों के माध्यम से सत्य के मार्ग पर चलना सिखाया, साथ ही साथ कैसे रहना है, कैसे अपने जीवन को आनंदमय बनाना है, और कैसे अपने जीवन को सुखपूर्वक जीना है। वृन्द जी ने दोहे का प्रयोग कर अपनी बात व्यक्त की है।

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