रीतिमुक्त कवियों की जीवनी |ritimukt kaviyon ki jivani

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आलम

आलम का जन्म 1655 ई . के आसपास स्वीकार किया गया है । ये सनाढ्य ब्राह्मण थे तथा मुगल सम्राट औरंगजेब के द्वितीय पुत्र मुअज्जमशाह के आश्रय में रहे थे । कुछ साहित्यकारों की मान्यता है कि आलम और शेख एक ही व्यक्ति हैं , किन्तु कुछ विद्वान यह धारणा व्यक्त करते हैं कि आलम की प्रेमिका एक रंगरेजिन थी और अच्छी कविता करती थी । उसका नाम शेख था । आचार्य शुक्ल के अनुसार आलम की रचनाओं में हृदय – तत्त्व की प्रधानता है । शृंगाररस की ऐसी उन्मादिनी उक्तियाँ इनकी रचनाओं में मिलती हैं कि पढ़ने और सुनने वाले लीन हो जाते हैं ।

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कवि आलम ने प्रेम के नितान्त व्यक्तिगत क्षणों को जीकर काव्य – रचना की थी । वास्तव में इनका प्रेम चेष्टाप्रधान न होकर आन्तरिक है । आलम के काव्य – संसार में संयोग के क्षण कम और वियोग के क्षण अधिक हैं । ऐसा लगता है कि आलम का सम्पूर्ण काव्य उनके हृदय का आलोड़न है । स्वच्छन्द काव्य के श्रेष्ठ कवि होने पर भी आलम परम्परागत प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाये थे । हाँ , जहाँ कहीं ये रीति परम्परा के प्रभाव से मुक्त हुए हैं वहीं इनकी कविता में भाव और भाषा का संतुलन आ गया है ।

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बोधा

बोधा का पूरा नाम बुद्धिसेन था । ये बांदा प्रान्त के राजापुर में रहने वाले थे तथा सरयूपारीण बाह्मण थे । पन्ना नरेश के यहाँ इनके सम्बन्धियों की अच्छी प्रतिष्ठा थी । इन्हें हिन्दी के अतिरिक्त संस्कृत और फ़ारसी का अच्छा ज्ञान था । इनका ग्रंथ ” इश्कनामा ” नाम से सामने आया है जिसमें इन्होंने अपनी प्रेयसी – सुभान की प्रशंसा की है । इनकी प्रसिद्धि लौकिक प्रेम के गायक के रूप में हुई । इन्होंने प्रेम – मार्ग को कठिन माना है । अकृत्रिमता , सहज प्रेमानुभूति और भाषा की स्वाभाविकता इनकी कविता की प्रमुख विशेषताएँ कहीं जा सकती हैं ।

ठाकुर

ठाकुर का जन्म 1766 ई . ओरछा में हुआ था । घनान्द की तरह ठाकुर ने भी अपनी काव्यगत मान्यताएँ स्थापित की हैं । इन्होंने काव्य को आत्मानुभूति – प्रेरित माना है । इनकी धारणा थी कि कविता साधना है , तपस्या है , उसमें ऊषा की मुस्कान और आँसू की ज्योत्स्ना है । इनकी कविता में निश्छल स्नेहिल अनुभूति देखते ही बनती है । प्रेम की गहराई और सरलता ठाकुर के काव्य में आपूरित है । इनके काव्य में लोक – जीवन का सहज संस्पर्श भी देखने को मिलता है । लोकोक्तिगर्भित प्रवाहपूर्ण भाषा , सहज अलंकृति , निश्छल प्रेमाभिव्यक्ति जैसे गुणों के कारण ठाकुर की कविता जनजीवन के अधिक निकट रही है ।

द्विजदेव

द्विजदेव का वास्तविक नाम मानसिंह था । इनका समय 1820-1861 ई . माना जाता है । इनका एकमात्र ग्रंथ ” श्रृंगारलतिका सौरभ ” है जिसमें स्वच्छन्द प्राकृतिक सौंदर्य देखते ही बनता है । द्विजदेव ऐसे कवि हैं जो एक साथ दोनों धाराओं को छूते हैं । परम्परामुक्त रहकर भी वे परम्परा से दूर नहीं जा पाते । इसलिए इनके काव्य में सौंदर्य के अद्भुत चित्र हैं और हृदय की गम्भीरता भी दिखलाई देती है।

घनानन्द

‘ स्वच्छन्द काव्यधारा ‘ के विकास में घनानन्द का योगदान सर्वाधिक है । इनका जन्म 1689 ई . में उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर जिले में हुआ था। किंवदंती है कि घनानंद को सुजान नाम की किसी वेश्या से विशेष लगाव था । ये दिल्ली के मुगल सम्राट मोहम्मदशाह के दरबार में गाना गाने के लिए जाया करते थे। कविता के सूक्ष्म यंत्र के द्वारा घनानन्द ने जीवन के अचेतन में छिपे हुए तत्त्वों को न बड़ी खूबी से खोज निकाला है ।

घनानन्द की अनुभूतियाँ ईमानदार हैं इसलिए वे भावों के लिए अनुकूल शब्दों की तलाश नहीं करते , बल्कि शब्द स्वयं उनके सामने आते रहे हैं और घनानन्द ने सहज भाव से उन्हें समेट लिया है । घनानन्द के काव्य का मूल विषय प्रेम और सौंदर्य है । प्रेम , सौंदर्य और श्रृंगार के दोनों पक्षों का मार्मिक चित्र घनानन्द के कवित्तों में देखा जा सकता है । भाषा की लाक्षणिकता , यत्र – तत्र मानवीकरण के प्रयोग और उक्ति – वैचित्र्य व वाक् कौशल उनकी कविता में पर्याप्त मात्रा में मिलता है । हमारी दृष्टि में छायावाद का आंदोलन यदि ब्रजभाषा में शुरू हुआ होता तो घनानन्द उसके प्रवर्तकों में एक होते ।

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